उत्तराखंड का इतिहास

 

उत्तराखंड का इतिहास मानव जाति के इतिहास जितना ही पुराना है । यहाँ कई शिलालेख, ताम्रपत्र व प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। जिससे गढ़वाल की प्राचीनता और इतिहास का पता चलता है।

आधिकारिक तौर पर उत्तराखंड राज्य, जिसे पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, भारत के उत्तरी हिस्से में एक राज्य है। इसे अक्सर देवभूमि के रूप में जाना जाता है जिसका कारण यहाँ बड़ी संख्या में हिंदू मंदिरों और तीर्थ केंद्र स्थित है । उत्तराखंड हिमालय, भाबर और तेराई के प्राकृतिक पर्यावरण के लिए जाना जाता है।

पौराणिक इतिहास के अनुसार

अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर)

पौराणिक ग्रन्थों में कुमाऊँ क्षेत्र मानसखंड के नाम से प्रसिद्ध था।  पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व,यक्ष,किन्नर,जातियों की सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं कुबेर की राजधानी अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर) बताई जाती हैं| पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के आश्रम में ऋषि मुनि तप व् साधना करते थे| अंग्रेज इतिहासकरों के अनुसार हुण, शक, नाग, खस आदि जातियां भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी| पौराणिक ग्रंथो में केदार खंड व् मानस खंड के नाम से इस क्षेत्र का ब्यापक उल्लेख हैं ।

 

 

गोपेश्नर में शिव-मंदिर में एक शिला पर लेख से ज्ञात होता है कि कई सौ वर्ष से यात्रियों का आवागमन इस क्षेत्र में होता आ रहा है।

शिव पुराण, मेघदूत, मार्कण्डेय पुराण व रघुवंश महाकाव्य में यहाँ की सभ्यता व संस्कृति का वर्णन हुआ है।

बौधकाल, मौर्यकाल व अशोक के समय के ताम्रपत्र भी यहाँ प्राप्त हुये हैं । इस भूमी का प्राचीन ग्रन्थों में देवभूमि या स्वर्गद्वार के रूप में वर्णन किया गया है। पवित्र गंगा हिमालया से निकलने के बाद हरिद्वार में ही मैदान को छूती है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों में वर्णित हरिद्वार को ही मायापुर कहा गया है ।

गंगा यहाँ हरिद्वार मे भौतिक जगत में उतरती है। इससे पहले वह सुर-नदी देवभूमि में विचरण करती है। इस भूमी में हर रूप शिव भी वास करते हैं, तो हरि रूप में बद्रीनारायण भी।

माँ गंगा का यह उदगम क्षेत्र उस देव संस्कृति का वास्तविक क्रीडा क्षेत्र रहा है जो पौराणिक आख्याओं के रूप में आज भी धर्म-परायण जनता के मानस में विश्वास एवं आस्था के रूप में जीवित हैं ।

उत्तराखंड की प्राचीन जातियों में किरात, यक्ष, गंधर्व, नाग, खस, नाथ आदी जातियों का विशेष उल्लेख मिलता है।

 

688 ई0 के आसपास चाँदपुर, गढ़ी (वर्तमान चमोली जिले में कर्णप्रयाग से 13 मील पूर्व ) में राजा भानुप्रताप का राज्य था । उसकी दो कन्यायें थी। प्रथम कन्या का विवाह कुमाऊं के राजकुमार राजपाल से हुआ तथा छोटी का विवाह धारा नगरी के राजकुमार कनकपाल से हुआ इसी का वंश आगे बढा।