कत्यूरी राजवंश

 

कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखण्ड पर लगभग तीन शताब्दियों तक एकछत्र राज किया ।  कत्यूरी राजवंश की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने अजेय मानी जाने वाली मगध की विजयवाहिनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. 

माना जाता है कि कत्यूरी शासन का आरंभ 850 ई. के लगभग हुआ, जो कि 1015 तक रहा. लेकिन समुद्रगुप्त (335 से 375 ई.) के मंत्री हरिषेणकृत प्रयाग स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रशस्ति के अनुसार कर्तिकेयपुर का राज्य अन्य सीमावर्ती राज्यों से समृद्ध राज्य था. इसके अवशेष आज भी बैजनाथ में रणचूलाकोट, तैलिहाट, सेलिहाट में देखे जा सकते हैं.

कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार पूर्व में डोटी से लेकर पश्चिम में यमुना तक तथा उत्तर में मानसरोवर से दक्षिण में रूहेलखंड तक हुआ करता था.

कत्यूरी शासनकाल में कलाकौशल के क्षेत्र में भारी तरक्की हुई. इस दौरान कई भव्य मंदिरों, मूर्तियों तथा उत्कृष्ट शिल्प वाले भवनों का निर्माण हुआ।

कत्यूरी साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा गणतांत्रिक हुआ करता था. इसका संचालन 18 सदस्यों वाली ‘अधिष्ठान’ द्वारा किया जाता था. उत्तरवर्ती काल में इसकी जगह ‘रजबार अधिष्ठान’ ने ले ली, जिसे 12 राजाओं की सभा भी कहा जाता था.

इतिहासकारों के अनुसार कत्यूरों की राजधानी मूलतः जोशीमठ में हुआ करती थी, जिसे ब्रह्मपुर नाम से पहचाना जाता था. राजा असन्तिदेव के समय में इसे कत्यूर (बैजनाथ) में स्थानांतरित कर दिया गया.

अटकिंसन ने अस्कोट, डोटी, पालीपछाऊँ से प्राप्त गुरुपादुका नामक पुस्तक के आधार पर एक चौथी वंशावली का भी वर्णन किया है. इसे अन्य तीनों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें वंशावली के अलावा कई राज कर्मचारियों के अलावा महत्वपूर्ण राजनीतिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन भी मिलता है.

इसके अनुसार जोशीमठ से शासन करने वाले कत्यूरी शासक थे—

1. अग्निराय,
2. फेलाराय,
3. सुबतीराय,
4. केशवराय,
5. बगड़राय,
6. आसन्तीराय,
7. वासन्तीराय,
8. गोरारे,
9. श्यामलराय,
10. इलणा देव,
11. प्रितमदेव,
12. धामदेव.