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1) उत्तराखंड भौतिक सरंचना
उत्तराखंड राज्य का ग्लोब मे विस्तार 28°43′ से 31°27′ उतरी अक्षांश तथा 77°34′ से 81°02′ पूर्वी देशांतर मध्य है ।
राज्य की लंबाई लगभग 358 km तथा उत्तर दक्षिण तक चौड़ाई लगभग 320 km है। राज्य का कुल क्षेत्रफल 53,483 km है जो कि भारत के कुल क्षेत्रफल का मात्र 1.69% है । क्षेत्रफल कि दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा जिला चमोली (8030 वर्ग km) और सबसे छोटा जिला चम्पावत (1766 वर्ग km ) है

2) स्वतंत्रता आंदोलन
चम्पावत जिले के बिसुग (लोहाघाट) गाँव के कालु सिंह मेहरा ने कुमाऊँ क्षेत्र मे गुप्त संगठन (क्रांतिवीर) बनाकर अंग्रेज़ो के खिलाफ आंदोलन चलाया । इन्हे उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का गौरव प्राप्त है । १८७० मे अल्मोड़ा मे डिबेटिंग क्लब कि स्थापना तथा 1871 से अल्मोड़ा अखबार के प्रकाशन से राज्य मे विशेषकर कुमाऊँ क्षेत्र से राजनेतिक चेतना का विस्तार हुआ ।

3)
कुमाऊँ क्षेत्र के किले
खगमरा किला – अल्मोड़ा के पूर्व मे स्थित इस किले का निर्माण राजा भीष्मचंद ने (1555-60) ने कराया था ।
लालमंडी किला – अल्मोड़ा के पलटन बाजार स्थित छावनी के भीतर इस किले को 1563 मे राजा कल्याणचंद ने बनवाया था । इसे फोर्ट मोयरा भी कहते हैं ।
राजबुंगा किला – चम्पावत मे स्थित इस किले को चंदवंशीय राजा सोमचंद ने बनवाया था ।
4) उत्तराखंड राजनैतिक इतिहास
कुमाऊँ क्षेत्र मे अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना 1912 मे की गई । विक्टर मोहन जोशी , बद्रीनाथ पांडे, चिरंजीलाल और हेमचन्द आदि ने मिलकर राज्य मे होमरूल लीग आंदोलन चलाया । 1916 में कुमाऊँ परिषद् का गठन 1926 में इसका विलय कांग्रेस में हो गया था। 1921 में बद्रीदत्त पांडेय , हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल के नेतृत्व में कुमाऊँ मंडल के ४० हजार स्वतत्रता सैनानियों ने बागेश्वर में सरयू के तट पर कुली बेगार न करने की शपथ ली और इससे संबंधित रजिस्टर नदी में बहा दिए गए।
5 ) राज्य आंदोलन के दौरान गठित संघठन
कुमाऊं परिषद – 1916 में गठन और 1926 में कांग्रेस में विलय
गडदेश सेवा संघ – 1938 में श्रीदेव सुमन ने गठन किया दिल्ली में। बाद में इसका नाम हिमालय सेवा संघ हो गया।
गढ़वाल जाग्रत संस्था – 1939 में कांग्रेस द्वारा पौड़ी में इस संस्था का गठन किया गया।
पर्वतीय राज्य परिषद – 25 जून 1967 को रामनगर के जनसभा में दयाकृष्ण पांडेय की अध्यक्षता में इस संस्था का गठन
उत्तराखंड क्रान्ति दल – 24 और 25 जुलाई 1979 को मसूरी के सम्मलेन में इस दल की स्थापना की गय। इसके प्रथम अध्यक्ष डॉ देवीदत्त पंत थे।
6 ) राज्य के प्रमुख बुग्याल
नंदनकानन – यह फूलों की घाटी के ऊपर है।
औली – चमोली (जोशीमठ से 15 km दूर) साहसिक पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्द
कैला – यह बुग्याल बदरीनाथ के चारों और फैला है
रूपकुंड – चमोली, यहाँ फेनकमल पुष्प अधिक मिलते हैं
कल्पनाथ – चमोली (बदरीनाथ मार्ग पर )
केदारकांठा – उत्तरकाशी , मखमली घास
7 )
उत्तराखंड का वनदान – बांज वृक्ष
बांज एक शीतोष्ण कटिबंधीय वृक्ष है। जिसका रासायनिक नाम कवरकस ल्यूकोटाइकोफोरा है। इस वृक्ष को शिव की जटा कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार एक वयस्क बांज का वृक्ष अपने जीवन काल में 1 ,40 ,00 ,000 रूपये के मूल्य का पर्यावरणीय लाभ पहुंचाता है।
8 )
वन नीतिया
सन 1865 में वनो से संबंधित भारत का पहला क़ानून भारतीय बन अधिनियम पास किया गया। स्वतत्रता के पश्चात 1948 में केंद्रीय वानिकी परिषद की स्थापना की गई। 1952 में नई राष्ट्रीय वन नीति बनाई गई और कुछ परिवर्तन के साथ 1998 में संशोधित राष्ट्रीय वन नीति बनाई गई
9)
वन संबंधी आंदोलन
रंवाई आंदोलन – टिहरी राज्य के राजा नरेंद्र शाह के वन क़ानून के खिलाफ विद्रोह करते आंदोलनकारियों पर ३० मई १९३० को दीवान चक्रधर जुयाल ने आंदोलनकारियों पर गोली चलवा दी। इस आंदोलन को तिलाड़ी काण्ड कहा जाता है।
चिपको आंदोलन – 1974 में चमोली जिले में गोपेश्वर नामक स्थान पर एक 23 वर्षीय विधवा महिला गौरा देवी द्वारा इस आंदोलन का नेतृत्व किया गया।
1977 का वन आंदोलन – वनो की नीलामी के विरोध में अक्टूबर 1977 में राज्य स्तरीय आंदोलन शुरू हुआ।

10 ) संकटग्रस्त जीव – के लिए विशेष प्रबंध
1972 में केदारनाथ वन्य जीव विहार की स्थापना मुख्य रूप से कस्तूरी मृग के सरंक्षण के लिए हुई।
1977 में महरूढ़ि में कस्तूरी मृग अनुसन्धान केंद्र की स्थापना की गई ।
1986 में कस्तूरी मृग के लिए पिथौरागढ़ में अस्कोट कस्तूरी मृग अभ्यारण की स्थापना की गई ।

11 )
ऐपण – ऐपण से तात्पर्य लीपने या सजावट करने से है , जो क़ि किसी मांगलिक या धार्मिक अवसर पर देहरी या आँगन में विस्वार (चावल के आटे का घोल) तथा लाल या सफ़ेद मिट्टी से सूंदर चित्रों के रूप में बनाई जाती है। इसके तहत सूर्या , चंद्र, स्वस्तिक, शंख , घंटा, विविध पुष्प , बेल, सर्प आदि आकृतियां बनाई जाती हैं इन्ही आकृतियों को चौक, रंगोली, अल्पना आदि नामो से जाना जाता है।

१२)
अनुसूचित जनजातियां –
उत्तराखंड में जौनसारी , थारू , भोटिया , बोक्सा , एवं राजी आदि जनजातियां निवास करती हैं। जिन्हे 1967 में ही अनुसूचित जनजाति घोषित
किया गया था। 5 जनजातियों में से सर्वाधिक जनसँख्या वाली जनजाति थारू है , जबकि सबसे कम जनसँख्या वाली जनजाति राजी है।

१३ )
उत्तराखंड मे विश्व विरासत
युनेस्को द्वारा अब तक उत्तराखंड मे नंदादेवी बायोस्फीयर 6 नवंबर 1982 को राष्ट्रिय पार्क और विश्व प्रसिद्ध फूलो कि घाटी को राष्ट्रीय पार्क 1982 और प्राकृतिक विरासत 1988 मे घोषित किया गया। जबकि चमोली जनपद के सलूड़ और डूंग्रा गावों के लोक उत्सव रम्माण को विश्व कि अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की श्रेणी मे रखा गया है । 2014 मे युनेस्को द्वारा देहारादून स्थित वन्य जीव संस्थान मे विश्व का प्रथम प्र।कृतिक विरासत केंद्र स्थापित किया है ।

14)
उत्तराखंड राज्य जल नीति : 2019
२३ अक्टूबर 2019 को अल्मोड़ा में हुई कैबिनेट क़ि बैठक में उत्तराखंड राज्य जल नीति 2019 के मसौदे को मंजूरी दी गई। जल नीति में राज्य के ३,550 वर्ग किमी० क्षेत्र में फैले 917 हिमनदों के साथ ही नदियों और प्रवाह तंत्र को प्रदूषण मुक्त करने और लोगों को शुद्ध पेयजल और सीवरेज निकासी सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। राज्य में जल विधुत क्षमता 27 , 039 मेगावाट आंकी गई है जबकि फिलहाल ३,९७२ मेगावाट जल विधुत का ही उत्पादन हो पा रहा है।

१५)
ऊर्जा नीति
उत्तराखंड सरकार ने २९ जनवरी २००८ को राज्य क़ि ऊर्जा नीति घोषित क़ि थी । इस नीति में वर्ष २०२० तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों से १००० मेगावाट क्षमता से अधिक बिजली उत्पादन क़ि प्रतिबद्धता जताई गई थी।

१६)
पंचायत राज का सफर
पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु भारत सरकार द्वारा अलग-अलग समय पर ४ समितियां गठित क़ि गई जिनमे –
बलवंत राय मेहता अध्ययन दल (1958)
अशोक मेहता समिति (1974)
जी० वी० के० राव समिति (1985)
एम्० एम्० सिंघवी समिति (1986)
वर्ष 1992 में संसद ने 73वां संशोधन विधेयक पारित किया और २१ अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति ने विधेयक को मंजूरी दी।
इस संशोधन के कारण पंचायते केंद्र एवं राज्य सरकारों के सामान सवैंधानिक दर्जा पा गई।

१७)
प्रसिद्द महिलायें
रानी कर्णावती – रानी के आदेश पर मुग़ल सैनिकों के नाक कान काट कर उन्हें भागने को मजबूर कर दिया गया। रानी कर्णावती तभी से नाक कटी रानी नाम से प्रसिद्द हो गई।
सरला बहन – मूल नाम मिस कैथरिन हैलीमेन : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,
बिशनी देवी शाह – स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , बागेश्वर। स्वतत्रता संग्राम में जेल जाने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला ।
गौरा देवी – चिपको आंदोलन की प्रथम सूत्रधार महिला। 19 नवम्बर 1986 को प्रथम वृक्ष मित्र पुरूस्कार से सम्मानित। चिपको वूमन के नाम से ख्याति प्राप्त।

18)
प्रमुख साहित्यकार
चंद्र कुंवर बर्त्वाल (20 अगस्त , 1919 -1947 ): प्रकृति के चितेरे कवि का जन्म तत्कालीन चमोली जनपद और अब रुद्रप्रयाग के मालकोटी गाँव में हुआ था। वह मात्र 28 वर्ष में ही हिंदी साहित्य के लिए अनमोल कविताओं का समृद्ध खजाना छोड़ गए।
डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल : कबीर ग्रंथावली , सतसई सप्तक , रामचंद्रिका , प्राणायाम , विज्ञानं और कला , रूपक रहस्य , गद्य सौरभ आदि।
गौरा पंत ‘शिवानी’ – हिंदी की शीर्षथ लेखिका , कथाकार एवं उपन्यासकार। पदमश्री सहित विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित। वर्ष २००३ में दिवंगत।
19 )
उत्तराखंड में खनिज सम्पदा
लोहा – नैनीताल के कालाढूंगी और रामगढ़ , चमोली के मोहनखाल , पौड़ी व् टिहरी गढ़वाल जिलों में लोहे के निक्षेप पाए गए हैं।
ताम्बा – गढ़वाल के दानपुर एवं पोखरी, देहरादून तथा अल्मोड़ा में प्राचीनकाल से ताम्बे का कार्य होता रहा है
खड़िया – देहरादून जनपद में महागांव और क्यारकुली तथा टिहरी गढ़वाल में सौंग नदी के किनारे रंगार गावं में खड़िया पायी जाती है
लाइमस्टोन – देहरादून , टिहरी गढ़वाल , पिथौरागढ़
मैग्नेसाइट – चमोली , बागेश्वर , पिथौरागढ़
२० )
गढ़वाल के परमार राजवंश
पंवार वंश की स्थापना कनकपाल ने 888 ईस्वी० में चंदपुरगढ़ में की थी
३७वें राजा अजयपाल ने समस्त गढ़वाल का एकीकरण किया और राजधानी पहले देवलगढ़ फिर श्रीनगर ले गया।
तिब्बत के विरूद्ध युद्ध में परमार सेनानायक माधोसिंह भंडारी और लोदी रिखोला ने असाधारण वीरता का परिचय दिया।
१४ मई १८०४ में गोरखों के हाथों प्रद्युम्नशाह की पराजय के बाद परमार नरेश अपना राज्य खो बैठे।