परीक्षा को निरस्त करने पर उठते कुछ गंभीर प्रश्न

 UKSSSC के अध्यक्ष गणेश मार्तोलिया ने प्रेस कोन्फ्रेंस करते हुये VDO/VPDO परीक्षा 2021 को निरस्त करने का फैसला लिया । साथ ही एक प्रेस विज्ञप्ति realese करते हुये निरस्त करने का कारण दिये गए । यह फैसला कुछ प्रमुख प्रश्नो को और वैधानिक तर्क के साथ जन्म देता है ।  

प्रश्न 1 : प्रेस विज्ञप्ति मे UKSSSC के letter Pad मे क्यूँ नहीं release किया गया ? प्रेस विज्ञप्ति मे किसी अध्यक्ष या सचिव के हस्ताक्षर क्यूँ नहीं किए गए ? क्या अभ्यर्थियों को अभी भी धोखे मे रखने की कोशिश की जा रही है ?

वैधानिक तर्क :  प्रेस और पुस्तको का पंजीकरण अधिनियम, 1867 (3) के अनुसार “भारत के भीतर मुद्रित प्रत्येक पुस्तक या कागज पर स्पष्ट रूप से मुद्रित किया जाना चाहिए , प्रिंटर का नाम और मुद्रण का स्थान और प्रकाशक का नाम और प्रकाशन का स्थान” इसलिए यह प्रेस विज्ञप्ति अवैध मानी जाती है । 

प्रश्न 2 : STF द्वारा वर्तमान मे भी जांच की जा रही है । जब जांच पूरी नहीं हुई तो परीक्षा रद्द करने के पीछे क्या कारण है ?

वैधानिक तर्क :  हाईकोर्ट ने एसटीएफ़ को जांच पूरी कर अपनी चार्जशीट तैयार कर कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिये थे । यदि कोई मामला अदालत के समक्ष विचाराधीन होता है तो कोर्ट का फैसला आने तक कोई जांच एजेंसी या सरकार स्वयं निर्णायक नहीं बन सकती ।

प्रश्न 3 : परीक्षा की शुचिता भंग होना अगर परीक्षा रद्द करने का कारण था तो जून को ही STF द्वारा पेपर लीक की पुष्टि कर कुछ दोषियों को हिरासत मे लिया गया , उसके बाद ही परीक्षा को रद्द क्यों नहीं किया गया ?

वैधानिक तर्क :   जोगिंदर पाल व अन्य बनाम पंजाब राज्य तथा इंद्रजीत सिंह कहलों बनाम पंजाब राज्य मामले मे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सरकार के लिए यह आवश्यक है कि दागी व्यक्तियों के मामलों को गैर-दागी लोगों से अलग किया जाए और केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए जो दागी हैं । दागी और गैर-दागी व्यक्तियों को एक साथ जोड़ने से, दो असमान वर्गों को एक साथ जोड़ दिया जाना जो कि भेदभावपूर्ण व्यवहार उनके लिए है जो बिना दोष के है, यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन के बराबर है । 

इसी लिए सरकार ने परीक्षा रद्द न कर जांच प्रक्रिया आगे बढाते हुये  गैर दोषी अभ्यर्थियों को दोषी अभ्यर्थियों से अलग करने के लक्ष्य के साथ ही जांच प्रक्रिया जारी रखी जिसमे एसटीएफ़ को कामयाबी मिली और 200+ अधिक दोषी अभ्यर्थियो कि पहचान कर ली गई । अतः परीक्षा को रद्द करना अन्यायपूर्ण फैसला है ।

प्रश्न 4  : आयोग द्वारा परीक्षा रद्द करने से अभ्यर्थियों के किन अधिकारों का हनन किया गया है ?

अनुच्छेद 21 , अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 16

वैधानिक तर्क : इस मामले का एक पहलू यह नहीं छोड़ा जा सकता है कि चयनित होने के बाद ईमानदारी से चुने गए उम्मीदवारों को नियुक्ति का अधिकार है क्योंकि उनका भविष्य कैरियर शामिल है।  प्रत्येक व्यक्ति को कानून के अनुसार अपनी आजीविका अर्जित करने और अपने करियर की उन्नति के लिए रोजगार का अधिकार है। अनुच्छेद 21 का उल्लंघन 

गैर दागी अभ्यर्थियों को भी दागी अभ्यर्थियों की सूची में रखकर समस्त चयन प्रक्रिया को निरस्त करना उनके सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है । अनुच्छेद 21 का उल्लंघन 

दागी और गैर-दागी व्यक्तियों को एक साथ जोड़ने से दो असमान वर्गों को एक साथ जोड़ दिया जाना , यह भेदभावपूर्ण व्यवहार उनके लिए जो बिना दोष के है, यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन के बराबर है ।

पूर्व मामलों मे भी न्यायालय के विचार :

जोगिंदर पाल व अन्य बनाम पंजाब राज्य मामले मे  न्यायालय की चिंता यह थी कि कुछ उम्मीदवारों के गलत कामों का खामियाजा ईमानदार और मेधावी उम्मीदवारों को न भुगतना पड़े । इसलिए, दागी उम्मीदवारों को उन लोगों से अलग करने का प्रयास किया जाना चाहिए जो बिना किसी कलंक के थे और उनकी सरासर योग्यता के कारण चुने गए थे न कि किसी अवैध विचार के कारण।

 

प्रश्न 5 : किन परिस्थितियों मे ही परीक्षा रद्द की जा सकती है ?

वैधानिक तर्क : जोगिंदर पाल व अन्य बनाम पंजाब राज्य मामले के अनुसार दागी को बेदाग अभ्यर्थियों से अलग करना असंभव या अत्यधिक असंभव पाया जाता है, तो ही समस्त चयन प्रक्रिया को निरस्त किया जा सकता  है । लेकिन vdo/vpdo प्रकरण मे अत्यधिक असंभव जैसा कुछ नहीं है ।

लेकिन vdo/vpdo प्रकरण मे एसटीएफ़ द्वारा सभी दोषी अभ्यर्थियों तक आसानी से पहुंचा गया और उनकी पहचान भी की गई है

 

प्रश्न 6: प्रदेश के मुख्यमंत्री व आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष व सचिव द्वारा मीडिया के माध्यम से लगातार परीक्षा मे मेहनत और ईमानदारी से पास अभ्यर्थियों को भरोसा क्यों दिलाया जा रहा था के उन्हे नियुक्ति दे दी जाएगी , और दोषी छात्रों की छंटनी कर दी जाएगी । सरकार और आयोग पर झूठ और धोखा देना और 8 महीने बाद परीक्षा निरस्त कर मानसिक शोषण करने का आरोप क्यों न लगे ?

वैधानिक तर्क : सरकार व आयोग ने ईमानदारी से चयनित अभ्यर्थियों को धोखे में रखा जिससे उनका जीवन प्रभावित हुआ है , उन्हे मानसिक शोषण का शिकार होना पड़ा। जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 268 के तहत दंडनीय अपराध है । सरकार द्वारा चयनित अभ्यर्थियों को झूठ और धोखे मे रखा गया जो भारतीय दंड संहिता की धारा 415 से 420 तक के अनुसार दंडनीय अपराध है । 

प्रश्न 7 : जब STF द्वारा 130+ अधिक दोषी अभ्यर्थियों की पहचान कर ली है साथ ही 80 संदिग्ध बताकर लीपा पोती की जा रही है । तो उन सभी दोषी अभ्यर्थियों को बाहर कर अन्य को नियुक्ति क्यू नहीं दी जा सकती ? 916 मे से 200 अभ्यर्थी अगर पहचान लिए गए हैं तो शेष 700 को नियुक्ति क्यों नहीं दी जा सकती ।

वैधानिक तर्क : सरकार के निरस्त करने के फैसले के पीछे इस बात को भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यह फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित था , क्योंकि अधिकांश अभ्यर्थी जो परीक्षा में सफल नहीं हो पाये उनके द्वारा सरकार पर रद्द करने का निरंतर दबाव बनाया गया । क्योंकि वे संख्या में चयनित हुए अभ्यर्थियों से कई गुना बढ़ी संख्या में हैं लिहाजा सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा ।

सरकार के द्वारा जांच आख्या न तो सार्वजनिक की गई है न ही माननीय उच्च न्यायालय को प्रदान की गई इसलिए भर्ती निरस्त करना औचित्य पूर्ण नहीं है ।

प्रश्न 8 : एसटीएफ़ द्वारा पेपर लीक प्रकरण मे जितने भी आरोपी पकड़े गए उन मे से अधिकांश सरकारी पदों मे थे , उन्हे वर्तमान मे जमानत दे दी गई है और उन्हे फिर से अपने विभागों मे बहाल भी कर दिया गया है । और इन सब की वजह से जो वास्तविक रूप से अपनी मेहनत से चयनित छात्र थे आज भी सड़कों मे धक्के खा रहे हैं क्या उनके लिए कोई मानव अधिकार नहीं है, दोषियों को जमानत और उन्हे वापस अपनी नौकरी मे बहाल करने के पीछे क्या सरकार कुछ छुपाना चाहती है क्या वे भी भ्रष्टाचार से ही उन पदो मे गए ? इसकी जांच क्यों नहीं की जा रही ?

वैधानिक तर्क :  अगर दोषी व्यक्ति जो सरकारी सेवा मे जुड़े हैं उनके भर्ती प्रक्रिया के बारे मे जांच से भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुंचा जा सकता है । यह जांच सरकार के गिरेबान तक न पहुंचे इसलिए भर्ती को निरस्त करके ही इससे पीछे छुड़ाना सरकार का मकसद हो सकता है । 

एसे ही तमाम प्रश्न हैं जो सोचने को मजबूर करते हैं । क्या सरकार को इनके जवाब नहीं देना चाहिए – 

प्रश्न 9 : सरकार ने बार बार दावा किया कि अब आगे आने वाले सभी परीक्षाएँ पारदर्शी और शुचितापूर्ण होगी , तो फिर 8 जनवरी 2023 मे पटवारी परीक्षा पेपर कैसे लीक हो गया ? क्या सरकार की बातों मे अभ्यर्थियों को भरोसा करना चाहिए , कि vdo/vpdo परीक्षा दोबारा होगी तो पूरी पारदर्शिता और शुचिता पूर्वक होगी ?

प्रश्न 10 : सरकार द्वारा अभी तक कौन सी नीति या कानून बनाया गया है जिससे यह अभ्यर्थी यह भरोसा कर सकते हैं कि आगामी परीक्षाएँ पूर्ण पारदर्शिता के साथ होंगी । अमर उजाला अंक *25 जनवरी 2023 के अनुसार पटवारी पेपर लीक प्रकरण मे भाजपा नेता का हाथ था ? तो सरकार इस पूरे पेपर लीक प्रकरण मे दोशियों को शह प्रदान कर रही है इसे क्यूँ नजरअंदाज किया जाये ?

प्रश्न 11 : परीक्षा होने के तुरंत बाद यानि एक दो दिन मे अगर पेपर लीक का मामला आ जाता है और शीघ्र ही परीक्षा रद्द निर्णय लिया जाये तो यह स्वाभाविक है । लेकिन परीक्षा होने के बाद 6 महीने के बाद लीक का प्रकरण सामने आए और उसके 7-8 महीने जांच चले फिर परीक्षा रद्द किया जाना स्वाभाविक नहीं है, पूरे 1 साल से भी अधिक समय से अपनी नियुक्ति का इंतजार करते ईमानदार व बेदाग अभ्यर्थी को इस प्रकार नहीं ठगा जा सकता ।